ये अफ़्शां हैं ( हैं नहीं थीं)…. मेरठ की। कल रात इनके मोहल्ले में एक शादी थी। बारात निकल रही थी। इनके अब्बा उसी बारात में शामिल होने की तैयारी कर रहे थे।
अफ़्शां भी बारात को देखने के लिए छत पर गईं। नीचे बाराती थिरक थे। इसी बीच किसी ने दोनाली लहरानी शुरू कर दी। देखते ही देखते हवाई फायर… बाराती झूम रहे थे। उधर उस दोनाली से निकली गोली अफ़्शां को जा लगी। जिस्म को चीरती हुई निकल गई। अफ़्शां वहीं पर ढेर। साथ में मौजूद लोग कुछ समझ भी नहीं सके। अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने कहा… Sorry. उधर बारात में अफरा तफरी मच गई। पुलिस पहुंची। मुकदमा हुआ। आज एक को गिरफ़्तार किया गया है।
अब एक और साइड इफेक्ट…
जिस घर में बारात जानी थी… वहां दो बहनों की शादी थी। बड़ी बहन की बारात दिल्ली से आई थी… छोटी की लोकल मेरठ से ही। दिल्ली वाला दूल्हा पहुंच गया। उसका निकाह हो गया। वो अपनी दुल्हन को लेकर चला गया। छोटी वाली का निकाह नहीं हो सका… उसका होने वाला दूल्हा, पुलिस से बचने के लिए कहीं छिप गया। (आज नहीं तो कल सामने आने ही होगा, भले गोली किसी और ने चलाई हो)। वो मेंहदी रचाए, दुल्हन का जोड़ा पहने बैठी रही… मेहमान आए, खाया पिया और तोहफ़ा/लिफाफा देकर निकल गए। उसकी ज़िंदगी में खुशी आने से पहले ही चली गई। उसका कोई कुसूर नहीं था… कुसूर तो उस एक गोली का था, जिसने एक को हमेशा के दुनिया से विदा कर दिया और एक की मायके से ससुराल की विदाई नहीं हो हो सकी…।
हर्ष फायरिंग कहते हैं इसे… क़ानून की जुबान में, मना है, लोग मानते नहीं हैं। पता नहीं क्यों नहीं मानते हैं। खुशी में फायरिंग का क्या
काम।







